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Showing posts from December, 2025

हर दिन एक अवसर है

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जिस व्यक्ति में आंतरिक प्रसन्नता है उसके सब दुःख मिटने शुरू हो जाते हैं यह प्रसन्नता का गुण है क।रण ढूंढते रह जाओगे तो कभी प्रसन्न नहीं  रह पाओगे। जिंदगी जितना स।दा रहेगा परेशानी उतना आधा रहेगा। समस्या की भी एक जड़ होती है उसे वहीं से ठीक करना शुरू करें , अच्छे की शुरुआत , अभी से शुरू करें ,और अपने अंदर का परिवर्तन करो। यह धीरे-धीरे करना पड़ेगा ,याद रखें कल की सुबह तब ठीक होगी ,जब आज की शाम को आप ठीक रखेंगे ।इसलिए शांत होकर बेफिक्र होकर सोए ,सुबह का स्वागत कभी चिंता और तनाव से ना करें। जीवन में तुलना मत करना  Must Watch This Video :- 

सब में एक जैसा भाव रखो

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सब में एक जैसा भाव रखो — यही निष्काम कर्म और आत्मनिर्भर जीवन की सच्ची पहचान है। अपने कर्मों के खिलाड़ी बनकर, अपने आनंद में जीना सीखें और प्रकृति की तरह जितना लें उससे अधिक लौटाने का भाव रखें। विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मकता, संतोष और कृतज्ञता बनाए रखते हुए गुण-ग्राहक बनें। समाज के उत्थान हेतु निस्वार्थ कर्म करें और सभी के प्रति समान दृष्टि विकसित करें। Must Watch This Video : 

वानप्रस्थ जीवन क्यों आवश्यक है?

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जब तक व्यक्ति के अंदर धर्म होता है तब तक उसके अंदर लाज, शर्म होता है। वह अपने बड़ों का मान सम्मान करता है, समाज की भी परवाह करता है। लेकिन अधर्मी व्यक्ति इन सबसे बहुत दूर रहता है। उसे किसी की भी परवाह नहीं होती है। जब हमारे अंदर दया प्रेम की भावना होगी तभी हम सहयोग और सहानुभूति के कारण दूसरों का भला करेगें और यही भावना हमारे अंदर सेवा भक्ति लाती है। चाहे वह अपने गुरु के प्रति हो या अपने राष्ट्र की प्रति हो।  संयम के साथ जीते हुए जब व्यक्ति अपने वानप्रस्थ जीवन को धारण करता है तो उसका रूप महात्मा का हो जाता है । तब उसे अपनी सेवा भक्ति और साधना के द्वारा अपनी आत्मा को ऊंचा उठाने का प्रयत्न करना चाहिए। must now:- 

जोड़ने वाले बने तोड़ने वाले नहीं

 सेवा का काम छोटा बड़ा नहीं होता ,अहंकार जलने से मनुष्य में निखार आता है आपके दिखावे से किसी पर असर नहीं पड़ता शरीर और वाणी का तप करना चाहिए इससे वाणी में शक्ति आती है तुम्हारी वाणी  अनुद्वेग वाली नहीं होनी चाहिए इससे बचना चाहिए अपनी संगति चुनना बहुत जरूरी है काटने वालों को कभी जीवन में  सम्मान नहीं मिलता हैं जो मिल।ने वाले होते हैं वह सफल होते हैं ऐसे अपने जीवन को ,बनाएं की मिलने के बाद लोग प्रसन्न हो और बिछड़ने के बाद दुखी हो जाए

भावपूर्वक माला जपो।

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भावपूर्वक माला जपो पिछले जन्मों के प्रभाव से सत्संग शुरू होता है एक न एक दिन सत्संग का रंग मनुष्य को लग ही जाता है और वह जीवन का हिस्सा बनना शुरू हो जाता है जिसमें आगे चलते-चलते साधना में रत होते हुए वह परम की तरफ बढ़ता है। वह  किसी भी स्थिति में अपने को विचलित नहीं करता और यही लगन व्यक्तिगत रूप से तो उसका उपकार करती है साथ ही समाज का भी कल्याण करती है और मनुष्य उस स्थान को प्राप्त करता है जो ब्रह्म का स्थान है जहां ब्रह्म का पहरा है वहां चिंता दुख नहीं है वहां तक पहुंचना है इसलिए श्रद्धा से अपनी भक्ति को बढ़ाएं और ऐसा व्यक्ति अपने साथ-साथ अपने पूर्वजों की भी सद्गति कर देता है must watch now :

आत्म संवाद करें

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 Must Watch above video : आत्म संवाद करें। हमें आनंद पूर्वक जीवन जीने की कोशिश करनी चाहिए। जब भी समय मिले एकांत में बैठकर स्वयं का चिंतन करें । आत्म संवाद करते हुए स्वयं का भला करें। और स्वयं का भला करते हुए आनंद लीजिए। हमें अपनी विशेषता को स्वयं ही समझना होगा। खुश रहने की आदत डालें ।सकारात्मकता से ही हमारे अंदर खुशी आती है। हम साधना कर सिद्धि को पा लेते हैं। लेकिन भगवान के स्वरूप को नहीं पहचान पाते हैं । अपने आंतरिक शक्ति को जगाने के लिए समय ,शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग करना चाहिए। हमें समृद्ध खुशहाल रहते हुए उन्नति भी करनी चाहिए और आध्यात्मिक प्रगति भी करनी चाहिए।

अपनी दैवीय संपदाओं को जगाएं।

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भगवान कहते हैं कि दैवीय संपदा को पहचान कर अपने अंदर जगाएं और अपने जीवन में लाएं। भगवान की दी हुई इस दैवीय संपदा को संभालते हुए हमें प्रतिदिन इसे बढ़ाते रहना चाहिए।  यदि कोई व्यक्ति मिले हुए सुअवसरों का सदुपयोग समय से नहीं करता है तो उसका जीवन भी दुखदाई हो जाता है। और यदि हम उस सुअवसर का सदुपयोग कर आगे बढ़ते हैं तो हमारा स्वागत लोक और परलोक  दोनों जगह के लोग करते हैं। जिससे हमारा जीवन सुखदाई हो जाता है ।इसके लिए हमें अपने बड़ों का सम्मान और युवाओं के प्रति ध्यान देते हुए अपने आर्थिक स्थिति को संभालना है। सबके जीवन में शांति आए उसका भी ध्यान देना है। इस तरह हमें अपने सत्कर्म, साधना, पुण्यकर्म और दिनचर्या को बेहतरीन बनाना है। समय रहते यदि हम इन सब पर ध्यान देंगे तो हमारा परलोक अवश्य सुधर जायेगा। Must watch this video: 

अपने कर्म को दिव्य बनाएं।

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अपने अंतिम समय में व्यक्ति जिस भावना से अपना शरीर का त्याग करता है। तो उसे वैसी ही शरीर की प्राप्ति होती है। इसलिए हमें अपने कर्म को दिव्य बनाते हुए नाम जपने वाले बनकर अपनी भावना को परमात्मा से जोड़े रखें। आप जिस भावना से अपने कार्य को करते हैं वह भावना बहुत अद्भुत होती है। इसलिए जब भी कोई कार्य करें तो दिव्य होकर करें। कृपा निश्चित ही प्राप्त होगी। और उसी रूप में जब शरीर का त्याग करते हैं तो सद्गति की प्राप्ति होती है । जिससे हमारा लोक और परलोक दोनों सुधरता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्म करते हुए अपने प्रगति और सद्गति दोनों का ध्यान रखना चाहिए। Must watch this video:-