वानप्रस्थ जीवन क्यों आवश्यक है?
जब तक व्यक्ति के अंदर धर्म होता है तब तक उसके अंदर लाज, शर्म होता है। वह अपने बड़ों का मान सम्मान करता है, समाज की भी परवाह करता है। लेकिन अधर्मी व्यक्ति इन सबसे बहुत दूर रहता है। उसे किसी की भी परवाह नहीं होती है। जब हमारे अंदर दया प्रेम की भावना होगी तभी हम सहयोग और सहानुभूति के कारण दूसरों का भला करेगें और यही भावना हमारे अंदर सेवा भक्ति लाती है। चाहे वह अपने गुरु के प्रति हो या अपने राष्ट्र की प्रति हो। संयम के साथ जीते हुए जब व्यक्ति अपने वानप्रस्थ जीवन को धारण करता है तो उसका रूप महात्मा का हो जाता है । तब उसे अपनी सेवा भक्ति और साधना के द्वारा अपनी आत्मा को ऊंचा उठाने का प्रयत्न करना चाहिए।
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