बुजुर्गों का सेवा सत्कार करें।
यदि हम अपने जीवन में किसी भी उत्कर्ष को पाने की इच्छा रखते हैं। तो अपने बड़े बुजुर्ग और गुरु को महत्व दें। अपने गुरु के वचनों को सुनें और उसे पर अम्ल करें, गुरु सेवा वाले बनें। यदि धरती पर सबसे कीमती कुछ है तो वह है हमारे लिए सद्गुरु। शिष्य का पहला फर्ज बनता है की वह हर दुविधा, अड़चन को समाप्त कर गुरु के मार्ग को आसान बनाएं तभी उसकी पात्रता सिद्ध होती है और उसे गुरु कृपा की प्राप्त होती है। इसलिए भगवान कहते हैं कि बड़ों का मान सम्मान करना, देवताओं, ब्राह्मणों , और गुरुजनों का पूजन करना तथा समाज में जो प्रज्ञा पुरुष हैं, समाज को दिशा देने वाले व्यक्ति हैं उनका आदर सत्कार करना उनकी सेवा करना यह एक तप है। जब हम आलस को त्याग कर सेवा में लगे होते हैं तो यह हमारा तप कहलाता है।
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