तितिक्षा तप क्या है?
व्यक्ति का स्वभाव जितना अधिक चंचल होता है। वह आंतरिक रूप से उतना ही कमजोर होता है। उसके जीवन में सहनशीलता और धैर्य की उतनी ही कमी होती है। जिससे वह स्वयं को नुकसान पहुंचता है। इसलिए स्वयं को आंतरिक रूप से शक्तिशाली बनायें और अपने समस्त इन्द्रियों को संयमित करें। यह भी एक तरह का तप है। जिसे हम तितिक्षा तप कहते हैं। जिसमें हम किसी दूसरे को बर्दाश्त करते हैं और उसके साथ जीवन निभाते हैं। तो यह हमारा तितिक्षा तप है। इस तप में हम स्वयं पर नियंत्रित कर संतुलन को बनाए रखने का अभ्यास करते हैं और प्रतिकूल परिस्थितियों को अपनी शक्ति बनाकर जीवन में आगे बढ़ते हैं।
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