चित्त की निर्मलता और बैर का त्याग: भक्ति का रहस्य!
चित्त की निर्मलता और बैर का त्याग: भक्ति का रहस्य!
जब तक कोई व्यक्ति जिंदा रहता है तभी तक उसकी दुष्टता भी जिंदा रहती है और तभी तक आप उससे बैर रख सकते हैं क्योंकि यही क्षत्रियों का धर्म है। लेकिन व्यक्तिगत धर्म कहता है कि जब तक आप अपने बैर को खत्म नहीं करेंगे तब तक आपकी ना ही भक्ति सफल होगी और ना ही आप चैन की नींद सो पाएंगे। जिस व्यक्ति की जीविका दूसरों पर आश्रित होती है वह व्यक्ति हमेशा दुखी रहता है। जब आप अहंकार रहित होकर आसक्ति से ऊपर उठते हुए माफ करना सीख जाते हैं और अपनी जिंदगी से संतुष्ट होकर आनंदपूर्वक जीवन जीतें हैं तो निश्चय ही आप प्रभु से जुड़कर उनकी कृपा को प्राप्त कर लेते हैं। जब व्यक्ति अपने चित्त को शांत निर्मल स्वच्छ और निर्भार कर साधना करते वक्त प्रार्थना करते-करते ध्यान में जाता है। तो वह अपनी चेतना को ऊपर की ओर उठाता है। जिससे उसके हृदय की पुकार इतनी गहरी हो जाती है कि ईश्वर झुककर उसके हाथ को पकड़ उसे अपनी गोद में बैठाने को मजबूर हो जाते हैं।
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